असम की राजनीतिक स्थिति में 'मियां' समुदाय को लेकर फिर से बयानबाजी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में एक सरकारी कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से कहा कि उनका प्रशासन इस समुदाय के प्रति सख्त रवैया बनाए रखेगा।
उन्होंने 'मियां' समुदाय को अवैध प्रवासी मानते हुए उन्हें राज्य छोड़ने के लिए दबाव डालने की बात की है। सरमा का यह बयान न केवल राज्य की जनसांख्यिकी बल्कि सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर गंभीर प्रश्न उठाता है।
सख्ती की आवश्यकत।
मुख्यमंत्री सरमा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि 'मियां' समुदाय के लोग असम में शांति से नहीं रह सकते। उनके अनुसार, इन लोगों को राज्य से बाहर करने के लिए लगातार सख्ती और प्रशासनिक दबाव आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब तक उनके लिए कठिनाइयाँ नहीं पैदा की जाएंगी, वे राज्य नहीं छोड़ेंगे। सरमा का मानना है कि अवैध रूप से रहने वाले लोगों को राज्य में काम करने या बसने की अनुमति देना कानून के खिलाफ है।
'मियां' शब्द का विवाद
असम में 'मियां' शब्द का उपयोग लंबे समय से बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए किया जाता रहा है। ऐतिहासिक रूप से इसे अपमानजनक माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में कई एक्टिविस्टों ने इसे अपनी पहचान और विरोध का प्रतीक बना लिया है। मुख्यमंत्री सरमा ने इस समुदाय पर धार्मिक केंद्रों और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया है। वे इसे राज्य की मूल संस्कृति के लिए खतरा मानते हैं।
आर्थिक बहिष्कार का संकेत
सरमा ने अपने पूर्व बयानों का समर्थन करते हुए एक विवादास्पद उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि यदि कोई 'मियां' रिक्शा चालक पांच रुपये मांगता है, तो उसे केवल चार रुपये देने चाहिए। मुख्यमंत्री का तर्क है कि कानून के अनुसार ये लोग राज्य में काम करने के योग्य नहीं हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि बांग्लादेश से आए लोग असम में रोजगार कैसे प्राप्त कर सकते हैं। यह बयान समुदाय के आर्थिक बहिष्कार की दिशा में एक संकेत माना जा रहा है।
जनसांख्यिकीय बदलाव की चेतावनी
मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी है कि अगली जनगणना तक असम में बांग्लादेशी मुसलमानों की जनसंख्या 40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। उन्होंने 'मियां' समुदाय पर 'लव जिहाद' और 'फर्टिलाइजर जिहाद' जैसे गंभीर आरोप भी लगाए हैं। उनका कहना है कि राज्य की जनसांख्यिकी में तेजी से हो रहे बदलावों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाना आवश्यक है। यह बयान राज्य में नागरिकता और पहचान के मुद्दों को फिर से चर्चा में लाता है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
सरमा के इस रुख ने असम में मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों पर नई बहस को जन्म दिया है। आलोचकों का मानना है कि इस तरह के बयानों से समाज में ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। वहीं, मुख्यमंत्री का कहना है कि वे केवल असम के मूल निवासियों के हितों की रक्षा कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि समुदाय उनकी सलाह का पालन नहीं करता है, तो सरकार को उनके खिलाफ और अधिक कठोर कदम उठाने के लिए
मजबूर होना पड़ेगा।
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